प्रबासी पुकार—सञ्जय मित्र

  • Wartman Kal Dainik
  • / समाचार /
  • २०७८ बैशाख ४, शनिबार (४ साल अघि)
  • ६ पटक पढिएको
प्रबासी पुकार—सञ्जय मित्र


बैशाख ०४ गते
सुना हो बाबु, सुना हो भैया, विदेश नआबा
अपन काम, अपन धाम, छोडके नआबा
बहुत भारी गलती कैली विदेश आबेके
पसेना खुन चुअले बुन तपले आगेके ।

दिन आ रात एके जे लेखा करही परले
केनहु जाऊ उहाँके याद दिलमे बरले
शरीर इहाँ करैअ काम मनमे नेपाल
अपन गाँओ अपन घर कैसन बेहाल ।

अपन काम करेमे लाज लागेके नचाहिँ
घाम न पानी गर्मी आ जाढा न धुप न छाँही
बहुत कडा कानुन हए ओतने कडाइ
भाषा आ भेष खान आ पिन संस्कृति पराइ ।

नहए मान ओहन सान अपना लेखिन
हँसेला डर चलेला डर सभीमे चेकिन
दुखाइ मुडी बोखार लागी न कौनो अपन
दबाइ बिरो सजम सेवा मनेमे दफन ।

नहए मौज तनिको मस्ती बनली मसिन
नहए शान्ति देह आ मन असिन पसिन
करते रहा सुखके खोजी मृग हो तिर्सना
सन्तुष्ट दिल होनाइ प्राप्त मृग ही तिर्सना ।

कहिया पुगी आबेला घरे समय इहाँके
बन्धन मुक्त होबई हम उडम इहाँसे
उडेके भाव अएते मन हर्षित होइअ
रहेके नाम सुनते फेर हर्ष भी रोइअ ।

पुगम देश देखम धर्ती चुमम ऊ माटी
अपन हावा भरम साँस जुराई ई छाती
मिलन होई आकाश धर्ती बिचमे शरीर
मिलम साथी फोरम धर्ती तोरम डँरीर ।

अपन देश सोनाके गाछी पेस्रमसे हिलाबा
प्रेसम बुद्धि सभी जे कोनो माटीसे मिलाबा
फगुआ छठ तिहार दशैँ मिलके मनाबा
विदेशी अतै कामके खोजे देशके बनाबा ।
३ चैत २०७७

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